कहानी मनविंदर मुंजल उर्फ मनु () फिटनस फ्रीक है। जिम का मालिक है। बॉडीबिल्डर है, एक लोकल चैंपियनशिप की तैयारी कर रहा है। डोले-शोले बनाने के लिए दिन-रात पसीना बहाता है। गोल को लेकर फोकस्ड है। हालांकि, जिम बिजनस में थोड़ा घाटा हो रहा है। ज्यादा लोग नहीं आ रहे हैं। लेकिन तभी वक्त बदलते हैं, हालात बदलते हैं, जज्बात बदलते हैं। मानवी बरार () की एंट्री होती है। वह जिम में जुम्बा इंस्ट्रक्टर बनकर आती हैं। इधर जिम में भीड़ बढ़ती है, उधर मनु और मानवी के दिलों में भी तितलियां उड़ने लगती हैं। लेकिन मानवी की जिंदगी में उसकी खूबसूरती से आगे भी बहुत कुछ है। यही कहानी का सार भी है और कहानी का नया मोड़ भी। रिव्यू हमने पर्दे पर बहुत सही प्रेम कहानियां देखी हैं। इन लव स्टोरीज में अक्सर एक-जैसी चीजें होती हैं। लड़का-लड़की मिलते हैं। थोड़ा रोमांस होता है। पहले नाराजगी होती है। फिर झगड़े होते हैं। पैचअप होता है और ब्रेकअप होता है। कहानी खत्म। लेकिन यहां कुछ अलग है। लड़का, लड़की मिलते हैं। लेकिन लड़की का एक पास्ट है, जो लड़का यानी मनु के लिए सबसे बड़ी परेशानी है। मनु एक मैचो मैन है। सिमरन साहनी की कहानी में मानवी एक बिंदास और बेधड़क किरदार है, जिसने पूरी हिम्मत के साथ अपनी जिंदगी को 'बदला' है। वह अब वो बनी है, जो वह बनना चाहती है। वह इस नई पहचान को लेकर गर्व भी महसूस करती है और आजाद भी। यह खुद की 'असलियत' को स्वीकार करने के साहस की भी कहानी है। लेकिन क्या समाज और उसका परिवार उसकी इस 'पसंद' को स्वीकार करेगा? क्या अपनी सामान्य दुनिया में अब 'सामान्य नहीं' रहेगी? डायरेक्टर अभिषेक कपूर फिल्म में झाड़ियों और पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचते हुए रोमांस दिखाने से ज्यादा सीधे मुद्दे पर आते हैं। मनु, उसके दोस्तों और परिवार से दर्शकों को मिलवाने के बाद डायरेक्टर साहब सीधे हमें मानवी की दुनिया में लेकर चलते हैं। धीरे-धीरे और बहुत ही सलीके से वह मानवी के बीते हुए कल का भी खुलासा करते हैं। वह जैसे-जैसे हमें मानवी के 'सच' के लिए तैयार करते हैं, वैसे ही मनु की सोच, उसके सदमे, उसके अविश्वास और उस डर को भी महसूस करवाते हैं, जो उसे उस लड़की के बारे में और अधिक जानने से रोकता है, जिसे वह बहुत प्यार करता है। लेकिन जब वह पल आता है, मनु उस पल में संभलता भी है और सबकुछ संभालता भी है। इसमें बहुत ज्यादा ड्रामा नहीं होता। अभिषेक ने फिल्म में गंभीर मुद्दा उठाया है। लेकिन साथ ही कई मौके पर हल्की-फुल्की कॉमेडी के साथ इसे मजेदार बनाए रखा है। हां, जहां कहीं भी मुद्दे की बात हुई है, उन्होंने उसे उसी संवेदनशीलता, गंभीरता और परिपक्वता के साथ दिखाया है। उन्होंने इस विषय से जुड़े हर पक्ष को शामिल किया है। फिर चाहे इसको लेकर हमारी कम जानकारी हो, सच को समझने और सीखने की बात हो, इससे जुड़े अपमान पर चर्चा हो, या जिस तरह से हमारा समाज 'समावेशी' होने की बात पर तेजी से बंट रहा है। अभिषेक कपूर ने बड़ी चालाकी से, सरल और सहज अंदाज में हल्की-फुल्की कॉमेडी के साथ सबकुछ एक माले में पिरोया है। सुप्रतीक सेन और तुषार परांजपे ने स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स पर बढ़िया काम किया है। कई सीन्स में यह बेहतरीन है। फिर चाहे, मुंजल परिवार का मनु पर शादी के लिए दबाव डालना हो, उसके विधुर पिता (गिरीश धमीजा) का मुस्लिम प्रेमिका से शादी करने का इंतजार हो, मानवी के पिता (कंवलजीत सिंह) का बेटी के पसंद को सपोर्ट करना हो, या फिर मनु की बहनों का उनके हर मामले में दखल देना हो... हर सीन में स्क्रीनप्ले टाइट है और यह आपको बांधे रखता है। आयुष्मान खुराना ने एक बार फिर पर्दे पर अपने किरदार को जीने का काम किया है। रोल के लिए उनका ट्रांसफॉर्मेशन और इसके लिए उनकी मेहनत झलकती है। उन्होंने मनु के किरदार को खूब एंजॉय किया है। चंडीगढ़ के लड़के के रोल में आयुष्मान की चाल-ढ़ाल सबकुछ दिल जीत लेती है। वाणी कपूर ने शुरू से अंत तक अपने किरदार में एक फ्लो को मेंटेन रखा है। कई मौकों पर वह बाकी सभी किरदारों पर भारी पड़ती हैं। वाणी और आयुष्मान की केमिस्ट्री भी जबरदस्त है। मनु के जुड़वा भाइयों के किरदार में गौरव और गौतम शर्मा ने दिल जीता है। मनु के दादा बने अंजान श्रीवास्तव, कंवलजीत सिंह, तान्या अबरोल और गिरीश धमेजा ने सपोर्टिंग किरदारों में रौनक ला दी है। बिंदिया छाबरिया का प्रोडक्शन डिजाइन वाइब्रेंट है। मनोज लोबो ने सिनेमेटोग्राफर के तौर पर खूबसूरत काम किया है। चंदन अरोड़ा की एडिटिंग में कसावट है। सचिन-जिगर का संगीत और प्रिया सरैया, वायु, आईपी सिंह के लिखे गीत सुनने में अच्छे लगते हैं और कहानी के साथ चलते हैं। हालांकि, फिल्म की शुरुआत में एक होली सॉन्ग है, जो अचानक पर्दे पर आ जाता है। कोरोना महामारी के बाद के इस दौर में जहां हम सभी एक 'न्यू नॉर्मल' को जी रहे हैं, वहीं आज यह भी चर्चा करने की जरूरत है कि आखिर सही मायने में 'नॉर्मल' क्या है। क्या हमने नॉर्मल लाइफ यानी सामान्य जीवन को लेकर खुद ही कई नियम-कानून बना लिए हैं? रूढ़िवाद की बेड़ियों को तोड़ने नहीं, तो कम से कम झकझोरने का समय आ गया है, हमें खुद के कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर इस पर काम करना ही होगा। 'चंडीगढ़ करे आशिकी' आपको झकझोरती है। आपको एंटरटेन करती है और साथ ही आपको मजबूर भी करती है कि आप यह सोचें कि 'नॉर्मल' होना क्या है।
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