रत्ना सिन्हा के डायरेक्शन में बनी फिल्म 'मिडल क्लास लव' रिलीज हो गई है। 'शादी में जरूर आना' फेम रत्ना की यह फिल्म मिडल क्लास फैमिली की चिंताओं के साथ ही एक लव ट्राएंगल की भी कहानी कहती है। पढ़िए ये रिव्यू और जानिए कैसी है ये फिल्म-
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Friday, September 16, 2022
Thursday, June 23, 2022
मूवी रिव्यू: जुग जुग जियो
अनिल कपूर, नीतू कपूर, वरुण धवन और कियारा आडवाणी स्टारर 'जुग जुग जियो' 24 जून को रिलीज है। शादी और रिश्तों की उलझन व तलाक जैसे सब्जेक्ट को डायरेक्टर राज मेहता ने कॉमिडी और ड्रामेटिक स्टाइल में परोसा है, जिसे देखना तो बनता है।
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Friday, May 20, 2022
मूवी रिव्यू: भूल भुलैया 2
कार्तिक आर्यन, तब्बू और कियारा आडवाणी के लीड रोल वाली फिल्म 'भूल भुलैया 2' रिलीज हो गई है। यह 2007 में अक्षय कुमार और विद्या बालन की सुपरहिट फिल्म 'भूल भुलैया' का सीक्वल है। इस हॉरर कॉमिडी फिल्म का डायरेक्शन अनीस बज्मी ने किया है।
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Wednesday, April 13, 2022
बीस्ट
'बाहुबली', 'पुष्पा', 'आरआरआर' जैसी साउथ फिल्मों की सफलता के बाद तमिल, तेलुगु, कन्नड़ हर भाषा की फिल्म बॉलिवुड में नाम कमाना चाहती है, यही वजह है कि बड़े गाजे-बाजे के साथ तमिल सुपर स्टार विजय की फिल्म बीस्ट को हिंदी रॉ के नाम से रिलीज किया गया। मगर अफसोस कमजोर कहानी और ढीला-ढाला स्क्रीन प्ले इस जांबाज रॉ की सारी मेहनत पर पानी फेर देता है।
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Friday, March 18, 2022
मूवी रिव्यू: जलसा
कहानी की शुरुआत ही एक शॉकिंग एलिमेंट से होती है। माया मेनन (विद्या बालन) बेहद ही चर्चित न्यूज पोर्टल की जानी -मानी एंकर और पत्रकार है। वो इतनी फेमस है कि शहर के कई होर्डिंग्स में उनके रौबदार फोटो नजर आते हैं। एक रात अपने बेबाक इंटरव्यू में रिटायर चीफ जस्टिस की बखिया उधेड़ने के बाद माया जब खुश और संतुष्ट होकर घर लौट रही होती हैं, और तब अचानक।
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Thursday, December 16, 2021
मूवी रिव्यू: स्पाइडरमैन- नो वे होम
कहानी दुनिया को पता चल चुका है कि पीटर पार्कर (टॉम हॉलैंड) ही स्पाइडर-मैन हैं। अब उसे इस कारण हो रही परेशानी से उबरना है। पीटर मदद के लिए डॉक्टर स्ट्रेंज (बेनेडिक्ट कम्बरबैच) की मदद लेता है। डॉक्टर स्ट्रेंज अपने जादू से इस परेशानी को दूर तो कर देते हैं, लेकिन इस कारण कई नई समस्याएं सामने आ जाती हैं, जो अब ज्यादा खतरनाक और ज्यादा बड़ी हैं। रिव्यू स्पइडर-मैन की पिछली फिल्म 'फार फ्रॉम होम' में जहां से पीटर पार्क की जिंदगी बदली थी, 'नो वे होम' वहीं से आगे बढ़ती है और समझाती है कि पीटर पार्कर के सच का दुनिया से छुपे रहना क्यों जरूरी है। यह न सिर्फ उसके लिए, बल्कि उसके दोस्तों और हर उस इंसान के लिए महत्वपूर्ण है, जिनसे पीटर प्यार करता है। पीटर को मदद चाहिए, वह डॉक्टर स्ट्रेंज के पास पहुंचना है। चाहता है कि कुछ ऐसा हो कि सब पहले की तरह हो जाए। जादूगर डॉक्टर स्ट्रेंज अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर दुनिया को स्पाइडर-मैन की पहचान भूलने के लिए मजबूर करते हैं, लेकिन पीटर के लिए यह सौदा भारी पड़ता है। वैसे, यह पहला मौका नहीं है जब मार्वल के मल्टीवर्स में हमने स्पाइडर-मैन को देखा है। इससे पहले 'इन टू द स्पाइडर-वर्स' (2018) में हमने कई चौंकाने वाली चीजें देखीं। लेकिन दिलचस्प है कि इस बार यह उन सब से बड़ा है। MCU यानी मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स में यह स्पाइडर-मैन की तीसरी फिल्म है जो ऐक्शन तो दिखाती ही है, लेकिन उससे दूर जाकर दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की भी कोशिश करती है। डायरेक्टर जॉन वाट्स ने इसे पर्दे पर अचानक नहीं किया है। फिल्म के बड़े कैनवस पर वह समय-समय पर हालात के अनुसार बिल्कुल माप-तौल कर ऐसा करते हैं। इस कारण फिल्म की लंबाई भी बढ़ जाती है। लेकिन डायरेक्टर जॉन वाट्स को इससे तकलीफ नहीं है। हालांकि, कुछ ऐसे सीन जरूर हैं, जो दर्शकों को जोड़ने में नाकामयाब होते हैं, लेकिन अधिकतर सीन्स में वह ऑडियंस संग इमोशनल कनेक्ट बनाने में सफल रहे हैं। फिल्म में ऐसे कई किरदार हैं, जो पुराने हैं। कई नए कैरेक्टर्स भी हैं। सभी ने अपना काम बखूबी किया है और डायरेक्टर की चाहत को पूरा करने में एक-दूसरे का सहयोग करते नजर आते हैं। अल्फ्रेड मोलिना और विलेम डैफो इस बात को फिल्म में पुख्ता करते हैं कि क्यों ओटो ऑक्टेवियस और नॉर्मन ओसबोर्न को न सिर्फ स्पाइडर-मैन की फिल्मों, बल्कि सुपरहीरोज की पूरी दुनिया में सबसे खतरनाक विलन माना जाना चाहिए। फिल्म के स्क्रीनप्ले में जेमी फॉक्स के मैक्स डिलन/इलेक्ट्रो के किरदार को भी अच्छे से भुनाया गया है। टॉम हॉलैंड के रूप में पीटर पार्कर को इस फिल्म में उनकी अब तक की सबसे बड़ी और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एक ऐक्टर के तौर पर वह इसे बेहतरीन तरीके से निभाते हैं। टॉम हॉलैंड साबित करते हैं कि वह अपने दम पर भी फिल्म को आगे बढ़ाने का माद्दा रखते हैं। फिल्म के बाकी कलाकारों को भी 2 घंटे 28 मिनट की इस लंबी फिल्म में पूरा स्पेस दिया गया है। फिल्म लंबी जरूर है, लेकिन डायरेक्टर ने इस रनटाइम का पूरा फायदा उठाया है। स्पाइडर-मैन की पिछली फिल्मों को देखने के बाद 'नो वे होम' को देखना आपके लिए सहज हो जाता है। कई ऐसी चीजे हैं, जिसे आप पिछली फिल्म से कनेक्ट करते हैं। हालांकि, यह सच है कि 'नो वे होम' पूरी तरह से एक मास-ऑडियंस वाली स्पाइडर-मैन फिल्म है। स्पाइडर-मैन मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स में एक ऐसा किरदार है, जो आपके किसी अच्छे पड़ोसी की तरह है। यह जरूरी भी है और एंटरटेनिंग भी। मार्वल ने कोशिश की है कि एवेंजर की टीम के इस सबसे छोटे सुपरहीरो को लोगों का भरपूर प्यार मिले। फिल्म यह असर छोड़ने में सफल रही है।
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Thursday, December 9, 2021
मूवी रिव्यू: चंडीगढ़ करे आशिकी
कहानी मनविंदर मुंजल उर्फ मनु () फिटनस फ्रीक है। जिम का मालिक है। बॉडीबिल्डर है, एक लोकल चैंपियनशिप की तैयारी कर रहा है। डोले-शोले बनाने के लिए दिन-रात पसीना बहाता है। गोल को लेकर फोकस्ड है। हालांकि, जिम बिजनस में थोड़ा घाटा हो रहा है। ज्यादा लोग नहीं आ रहे हैं। लेकिन तभी वक्त बदलते हैं, हालात बदलते हैं, जज्बात बदलते हैं। मानवी बरार () की एंट्री होती है। वह जिम में जुम्बा इंस्ट्रक्टर बनकर आती हैं। इधर जिम में भीड़ बढ़ती है, उधर मनु और मानवी के दिलों में भी तितलियां उड़ने लगती हैं। लेकिन मानवी की जिंदगी में उसकी खूबसूरती से आगे भी बहुत कुछ है। यही कहानी का सार भी है और कहानी का नया मोड़ भी। रिव्यू हमने पर्दे पर बहुत सही प्रेम कहानियां देखी हैं। इन लव स्टोरीज में अक्सर एक-जैसी चीजें होती हैं। लड़का-लड़की मिलते हैं। थोड़ा रोमांस होता है। पहले नाराजगी होती है। फिर झगड़े होते हैं। पैचअप होता है और ब्रेकअप होता है। कहानी खत्म। लेकिन यहां कुछ अलग है। लड़का, लड़की मिलते हैं। लेकिन लड़की का एक पास्ट है, जो लड़का यानी मनु के लिए सबसे बड़ी परेशानी है। मनु एक मैचो मैन है। सिमरन साहनी की कहानी में मानवी एक बिंदास और बेधड़क किरदार है, जिसने पूरी हिम्मत के साथ अपनी जिंदगी को 'बदला' है। वह अब वो बनी है, जो वह बनना चाहती है। वह इस नई पहचान को लेकर गर्व भी महसूस करती है और आजाद भी। यह खुद की 'असलियत' को स्वीकार करने के साहस की भी कहानी है। लेकिन क्या समाज और उसका परिवार उसकी इस 'पसंद' को स्वीकार करेगा? क्या अपनी सामान्य दुनिया में अब 'सामान्य नहीं' रहेगी? डायरेक्टर अभिषेक कपूर फिल्म में झाड़ियों और पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचते हुए रोमांस दिखाने से ज्यादा सीधे मुद्दे पर आते हैं। मनु, उसके दोस्तों और परिवार से दर्शकों को मिलवाने के बाद डायरेक्टर साहब सीधे हमें मानवी की दुनिया में लेकर चलते हैं। धीरे-धीरे और बहुत ही सलीके से वह मानवी के बीते हुए कल का भी खुलासा करते हैं। वह जैसे-जैसे हमें मानवी के 'सच' के लिए तैयार करते हैं, वैसे ही मनु की सोच, उसके सदमे, उसके अविश्वास और उस डर को भी महसूस करवाते हैं, जो उसे उस लड़की के बारे में और अधिक जानने से रोकता है, जिसे वह बहुत प्यार करता है। लेकिन जब वह पल आता है, मनु उस पल में संभलता भी है और सबकुछ संभालता भी है। इसमें बहुत ज्यादा ड्रामा नहीं होता। अभिषेक ने फिल्म में गंभीर मुद्दा उठाया है। लेकिन साथ ही कई मौके पर हल्की-फुल्की कॉमेडी के साथ इसे मजेदार बनाए रखा है। हां, जहां कहीं भी मुद्दे की बात हुई है, उन्होंने उसे उसी संवेदनशीलता, गंभीरता और परिपक्वता के साथ दिखाया है। उन्होंने इस विषय से जुड़े हर पक्ष को शामिल किया है। फिर चाहे इसको लेकर हमारी कम जानकारी हो, सच को समझने और सीखने की बात हो, इससे जुड़े अपमान पर चर्चा हो, या जिस तरह से हमारा समाज 'समावेशी' होने की बात पर तेजी से बंट रहा है। अभिषेक कपूर ने बड़ी चालाकी से, सरल और सहज अंदाज में हल्की-फुल्की कॉमेडी के साथ सबकुछ एक माले में पिरोया है। सुप्रतीक सेन और तुषार परांजपे ने स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स पर बढ़िया काम किया है। कई सीन्स में यह बेहतरीन है। फिर चाहे, मुंजल परिवार का मनु पर शादी के लिए दबाव डालना हो, उसके विधुर पिता (गिरीश धमीजा) का मुस्लिम प्रेमिका से शादी करने का इंतजार हो, मानवी के पिता (कंवलजीत सिंह) का बेटी के पसंद को सपोर्ट करना हो, या फिर मनु की बहनों का उनके हर मामले में दखल देना हो... हर सीन में स्क्रीनप्ले टाइट है और यह आपको बांधे रखता है। आयुष्मान खुराना ने एक बार फिर पर्दे पर अपने किरदार को जीने का काम किया है। रोल के लिए उनका ट्रांसफॉर्मेशन और इसके लिए उनकी मेहनत झलकती है। उन्होंने मनु के किरदार को खूब एंजॉय किया है। चंडीगढ़ के लड़के के रोल में आयुष्मान की चाल-ढ़ाल सबकुछ दिल जीत लेती है। वाणी कपूर ने शुरू से अंत तक अपने किरदार में एक फ्लो को मेंटेन रखा है। कई मौकों पर वह बाकी सभी किरदारों पर भारी पड़ती हैं। वाणी और आयुष्मान की केमिस्ट्री भी जबरदस्त है। मनु के जुड़वा भाइयों के किरदार में गौरव और गौतम शर्मा ने दिल जीता है। मनु के दादा बने अंजान श्रीवास्तव, कंवलजीत सिंह, तान्या अबरोल और गिरीश धमेजा ने सपोर्टिंग किरदारों में रौनक ला दी है। बिंदिया छाबरिया का प्रोडक्शन डिजाइन वाइब्रेंट है। मनोज लोबो ने सिनेमेटोग्राफर के तौर पर खूबसूरत काम किया है। चंदन अरोड़ा की एडिटिंग में कसावट है। सचिन-जिगर का संगीत और प्रिया सरैया, वायु, आईपी सिंह के लिखे गीत सुनने में अच्छे लगते हैं और कहानी के साथ चलते हैं। हालांकि, फिल्म की शुरुआत में एक होली सॉन्ग है, जो अचानक पर्दे पर आ जाता है। कोरोना महामारी के बाद के इस दौर में जहां हम सभी एक 'न्यू नॉर्मल' को जी रहे हैं, वहीं आज यह भी चर्चा करने की जरूरत है कि आखिर सही मायने में 'नॉर्मल' क्या है। क्या हमने नॉर्मल लाइफ यानी सामान्य जीवन को लेकर खुद ही कई नियम-कानून बना लिए हैं? रूढ़िवाद की बेड़ियों को तोड़ने नहीं, तो कम से कम झकझोरने का समय आ गया है, हमें खुद के कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर इस पर काम करना ही होगा। 'चंडीगढ़ करे आशिकी' आपको झकझोरती है। आपको एंटरटेन करती है और साथ ही आपको मजबूर भी करती है कि आप यह सोचें कि 'नॉर्मल' होना क्या है।
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Friday, December 3, 2021
मूवी रिव्यू: बॉब बिस्वास
हिरेन कोटवानीलंबे समय से की फिल्म '' चर्चा में थी। इस थ्रिलर फिल्म में खास तौर पर अभिषेक बच्चन के लुक्स पर काफी चर्चा चली है। अब यह फिल्म ओटीटी प्लैटफॉर्म जी फाइव और सिनेमाघरों दोनों में रिलीज हो गई है। फिल्म में अभिषेक बच्चन के साथ चित्रांगदा सिंह, अमर उपाध्याय और मनीष वर्मा जैसे कलाकार मुख्य भूमिकाओं में हैं। कहानी: बॉब बिस्वास (अभिषेक बच्चन) ऐक्सिंडेट के बाद 8 सालों तक कोमा में रहा था। अब उसे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज किया जा चुका है। लेकिन बॉब बिस्वास अपनी यादाश्त खो चुका है और अपनी पत्नी मैरी बेटे बेनी और बेटी मिनी को नहीं पहचानता है। बॉब अपनी नई जिंदगी शुरू करे इसी बीच दो पुलिसवाले जिशू नारग और खराज साहू उसे बहकाते हैं और उसे बताते हैं कि वह एक पेशेवर हत्यारा रहा है और उसे अपने काम पर वापस लग जाना चाहिए। अब बॉब बेहद मुश्किल में हैं क्योंकि वह हत्याएं नहीं करना चाहता। अपने कल और आज से बॉब की कहानी ही फिल्म में दिखाई गई है। रिव्यू: जैसा कि पहले ही पता है कि यह बॉब बिस्वास का किरदार सुजॉय घोष की 2012 में आई फिल्म 'कहानी' के एक हत्यारे पर आधारित है। पिछली फिल्म में इस किरदार को बंगाली फिल्मों के ऐक्टर शाश्वत चटर्जी ने निभाया था। यह किरदार बहुत छोटा था लेकिन लोगों को आज तक याद है। इस फिल्म में बॉब के किरदार को मरा हुआ दिखाया गया था। लेकिन अब इस कहानी को सुजॉय घोष ने आगे बढ़ाया है। कहानी तो सुजॉय घोष की है मगर इस बार फिल्म का डायरेक्शन उनकी बेटी दीया अन्नपूर्णा घोष ने किया है। यह 'कहानी' का प्रीक्वल है। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है बॉब अपने स्याह पहलू को जानने लगता है। फिल्म की शूटिंग कोलकाता में हुई है और दीया का डायरेक्शन कसा हुआ है। ऐक्टिंग: यह फिल्म पूरी तरह से अभिषेक बच्चन की फिल्म है। चित्रांगदा सिंह ने बॉब की पत्नी मैरी का किरदार निभाया है जो बहुत बड़ा नहीं है। फिल्म में चित्रांगदा काफी खूबसूरत लगी हैं उसमें उन्होंने अलग-अलग इमोशंस को बहुत अच्छी तरह से दिखाया है। फिल्म में बांग्ला किरदारों को बंगाली ऐक्टर्स ने ही निभाया है। यह बात कहने वाली है कि भले ही लोग बॉब के किरदार में आज भी शाश्वत चटर्जी को याद करते हों मगर फिर भी अभिषेक ने अपना किरदार बेहद समझदारी के साथ निभाया है। पूरी फिल्म में वह एक-एक सीन में मंझे हुए दिख रहे हैं। यह एक बेहद कठिन किरदार था जो अभिषेक ने अच्छी तरह निभाया है। वैसे इससे पहले अभिषेक युवा, गुरु, रावण और बिग बुल में अपनी ऐक्टिंग के जलवे दिखा चुके हैं। क्यों देखें: यह फिल्म 'कहानी' जैसी मजबूत फिल्म तो नहीं है मगर काफी दिलचस्प है। अभिषेक बच्चन की ऐक्टिंग के लिए देखी जा सकती है।
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मूवी रिव्यू: तड़प
कहानी ईशान () मसूरी का छोरा है। उसे एक छोरी से प्यार हो जाता है। नाम है रमिसा (), जो एक लोकल नेता की बेटी है। लंदन से पढ़ी है। पहली नजर में यह फिल्म आपको एक टिपिकल गरीब लड़के और अमीर लड़की की प्रेम कहानी लग सकती है। लेकिन असल में ऐसा है नहीं, क्योंकि कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इसकी कई परतें खुलती जाती हैं। रिव्यू किसी भी फिल्ममेकर के लिए किसी न्यूकमर को लॉन्च करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती होती है। ऐसा इसलिए कि उसे सबसे बेहतरीन रूप में प्रजेंट करना चैलेंजिंग होता है। एक ऐक्टर के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह मिले हुए स्क्रीन स्पेस में अपना बेस्ट दे सके। मिलन लुथरिया के डायरेक्शन में बनी 'तड़प' में शुरुआती सेकेंड्स पूरी तरह से अहान शेट्टी पर फोकस हैं। उन्हें एक एंग्री यंग मैन वाली छवि देने की कोशिश की गई है, जो अपनी लेडी लव तारा सुतारिया के लिए जुनून से भरा हुआ है। 'तड़प' साल 2018 में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म 'आरएक्स 100' का रीमेक है, जो असल घटनाओं पर आधारित थी। इंटरवल तक यह फिल्म आपको एक टिपिकल लव स्टोरी लगती है। इसमें एक गरीब लड़का है। एक अमीर लड़की है। वही पुराना मसाला कि लड़की की शादी पिता की मर्जी से हो रही है। लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म अचानक से बदल जाती है। प्यार जुदा हो जाता है। जुनून हद पार करने लगता है। ईशान का किरदार फिल्म में धीरे-धीरे बड़ा होता जाता है। वह गंभीर है, थोड़ा गुस्सैल है और जुनून से भरा हुआ है। अपने डेब्यू फिल्म में अहान के लिए यह एक सही किरदार है। हालांकि, उनके डायलॉग डिलिवरी पर थोड़ी और मेहनत हो सकती है। अहान स्क्रीन पर अच्छे लगते हैं। डेब्यू फिल्म में ही उनमें एक चमक दिखती है। फिल्म के राइटर रजत अरोड़ा ने कहानी और डायलॉग्स के बूते अहान को एक ऐक्शन-रोमांस हीरो के तौर पर पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मिलन लुथरिया की फिल्में वैसे भी भारी-भरकम डायलॉग्स के लिए जाने जाते हैं। 'तड़प' में भी वह इस विधा में निराश नहीं करते हैं। हालांकि, कई बार यह बतौर दर्शक आपके लिए ज्यादा हो जाता है। फिल्म का प्लॉट और इसकी कहानी एक समय के बाद फंसी हुई, थकी हुई लगने लगती है। फिल्म में अहान के पिता का रोल निभाया है सौरभ शुक्ला है। पूरा मसूरी उन्हें 'डैडी' बुलाता है। सौरभ शुक्ला ने पर्दे पर अपना काम बखूबी किया है। वह पर्दे पर जो भी कहते और करते हैं, आपको वह अच्छा लगता है। ईशान की लेडी लव रमिसा के किरदार में तारा सुतारिया फिल्म में खूबसूरत लगी हैं। फिल्म में रोमांटिक सीन हो या फिर इमोशनल रोने वाला, तारा आपको सुंदर लगती हैं। हालांकि, स्क्रीनप्ले में उनके पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं है। लेकिन फिर भी यदि उन्हें थोड़ा स्पेस और मिलता तो वह निखरकर सामने आतीं। फिल्म अपनी कहानी के लेवल पर मात खाती है। 2 घंटे 10 मिनट के रनटाइम में यह कई मौकों पर आपको थकाती है। उबाऊ लगती है। इंटरवल से पहले जहां फिल्म धीमी रफ्तार में हवा के झोंके की तरह चलती है, वहीं सेकेंड हाफ में ऐसा लगता है जैसे इसने कोई रेस ट्रैक पर दौड़ना शुरू कर दिया हो। फिल्म में कई ट्विस्ट हैं, जो ड्रामा क्रिएट करते हैं। कुछ दमदार ऐक्शन सीन्स हैं। एक दर्शक के तौर पर आधी फिल्म आपको ठीक-ठीक लगती है और आधी बिल्कुल रोमांचक। प्रीतम के गाने गुनगुनाने लायक हैं। यह लव स्टोरी के लिए अच्छा भी है। मसूरी की खूबसूरती को दिखाने में सिनेमेटोग्राफी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह तथ्य है कि 'तड़प' एक कर्मशियल फिल्म है। लेकिन इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि कुछ ऐसे सीक्वेंस हैं, जो फिल्म में फिट होने में समय लेते हैं। 'तड़प' एक ऐसी लव स्टोरी है, जिसका जुनून दर्शकों को भावनात्मक रूप से नहीं जोड़ पाता है। कुल मिलाकर 'तड़प' एक ऐसी फिल्म है, जिसमें रोमांस है, ऐक्शन है, संगीत है और खूबसूरत वादियां हैं। बहुत अच्छा होता यदि स्क्रीनप्ले पर थोड़ी और मेहनत होती, लव स्टोरी में कुछ और ऐसा होता, जो फिल्म देखने के बाद दर्शक एक हसीन याद की तरह घर लेकर लौटते।
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Saturday, November 27, 2021
मूवी रिव्यू: अंडमान
आपने IAS बनने के लिए तैयारी की है? आईएएस की तैयारी में जो ताने समाज, परिवार और रिश्तेदारों से मिलते हैं वह आप इस फिल्म की शुरूआत में देख पाएंगे। यह फिल्म एक ऐसे आदमी के बारे में है जो सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है मगर सिलेक्ट नहीं हुआ। इसके बाद वह एक पंचायत सचिव बन जाता है। दरअसल यह फिल्म भारतीय व्यवस्था की सच्चाई दिखाती है। यह एक छोटी सी फिल्म है जो प्रशासनिक लालफीताशाही, जातिवाद, ग्रामीण विकास की समस्या और सांप्रदायिकता को एक साथ समेटने की कोशिश करती है। शायद आज हमारे प्रशासन के हर अधिकारी को यह फिल्म देखनी चाहिए। अधिकारी इस फिल्म को इसलिए देखें क्योंकि आपको बेहतर हिंदुस्तान देखना है या नहीं? बस यह फिल्म इसी बारे में है। रिव्यू: यह फिल्म हमारी व्यवस्था के लिए तीखा कटाक्ष है। यह फिल्म हमारी व्यवस्था की सारी पोल खोल रही है। आप कितने भी विकसित होने की बात करें लेकिन जाति व्यवस्था हमारे समाज को जकड़ी हुई है। कोई खास फर्क नहीं पड़ा है, जब दलित ग्राम प्रधान बोलता है- काम छोड़कर आए हैं, नहीं तो डांट खा जाएंगे। यह ग्रामीण भारत की सच्चाई है। एक पंचायत सचिव है जो आईएएस में सिलेक्ट नहीं हो पाया। बीच में कोरोना वायरस भी आ जाता है। उसके बाद लॉकडाउन लगता है। पंचायत सचिव के एक गांव में है और वहां बनता है क्वॉरेंटीन सेंटर मतलब वहां लोगों को रखना है। भावनाओं में बहकर मैं आपको पूरी कहानी नहीं बताऊंगा लेकिन फिल्म में देखने के लिए बहुत कुछ है। फिल्म में बहुत कुछ अच्छा है, जैसे पंचायत सचिव स्टैंड ले रहा है और उसमें दलित प्रधान को साथ लेता है। काश, हमारे सारे अधिकारी ऐसे ही होते। फिल्म देखते हुए आपको शायद कुछ वेब सीरीज 'पंचायत' की याद आ जाए। लेकिन मुद्दा हमारे गांवों की बेहतरी का है जो अब कुछ फिल्ममेकर उठा रहे हैं। हालांकि बहुत सी चीजें ऐसी हैं जो आपको अजीब लग सकती हैं जैसे लोअर मिडिल क्लास पंचायत सचिव आईफोन यूज कर रहा है। वैसे एक बात कहने वाली है कि कोरोना वायरस और लॉकडाउन पर बनने वाली यह अच्छी फिल्म है। डायरेक्टर स्मिता सिंह ने कुछ मजाकिया सीन्स के साथ बहुत अच्छी फिल्म बनाई है। इसमें 'वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी' पर भी तीखा कटाक्ष किया गया है मतलब सोशल मीडिया से दूर रहिए, वहां हर जानकरी सही नहीं है। सही बात जो जानने वाली है वो ये है कि अगर कोई आदमी अपनी ड्यूटी ठीक से करे तो उसे कोई नहीं रोक सकता। दहेज लिए एक अधिकारी का एक डायलॉग भी है- सॉरी सर, काल मार्क्स पढ़ा है, याद भी है, लेकिन ससुराल वाले जबरदस्ती रख गए। यानी समाज का दोहरा रवैया यहां आपको खुलकर देखने को मिलेगा। जातिवाद पर जो प्रहार इस फिल्म में किया गया है शायद कम ही फिल्मों में देखने को मिलता है। फिल्म में दिखाया गया है कि एक वक्त के बाद कैसे हर समाज कोरोना वायरस से डर जाता है। यह फिल्म कम से कम आज के माहौल में लोगों को जागरूक करने के लिए बहुत जरूरी है। फिल्म बीच में उपदेश देने वाली लगने लगती है कि केवल यह कोरोना का मेसेज दे रही है जबकि यह अच्छी तरह विकसित हो रही थी। फिल्म का सेकंड हाफ में पूरी तरह ट्रैक से उतर जाती है और आपको बोरियत होने लगती है। फिल्म की शुरूआत जितनी अच्छी है उसे उस हिसाब से विकसित नहीं किया गया है। स्मिता सिंह डेब्यूटेंट डायरेक्टर हैं और पत्रकार रह चुकी हैं, शायद इस फिल्म से वह बेहतर समझ विकसित कर पाएंगी। फिल्म छोटी होती तो बेहतर होता। ऐक्टिंग: फिल्म को और जैसे बड़े ऐक्टर्स के नाम पर प्रमोट करने की कोशिश की गई है लेकिन ये इस फिल्म की यूएसपी नहीं हैं। फिल्म का हीरो समाज का रीयल हीरो है। फिल्म के ऐक्टर्स आपको अनजाने से लग सकते हैं लेकिन इनकी ऐक्टिंग काबिले तारीफ है। फिल्म के लीड ऐक्टर आनंद राज ने न केवल फिल्म में अभिमन्यु प्रताप के तौर पर पर पंचायत सचिव की मुख्य भूमिका निभाई है बल्कि फिल्म लिखी भी है। आनंद राज ने अच्छी ऐक्टिंग की है लेकिन ईमानदारी से कहा जाए फिल्म का सेकंड हाफ थोड़ा कमजोर है जो आपको बांधे रखने के काबिल नहीं है। सपोर्टिंग रोल में सभी ऐक्टर अपने हिस्से का काम अच्छी तरीके से करके गए हैं। बेहतर होता कि स्मिता सबकुछ एक ही फिल्म में समेटने के बजाय अलग-अलग फिल्में बनातीं, ज्यादा मजबूत बनतीं। हालांकि फिल्म का अंत बचकाना है लेकिन कोशिश यह भी बुरी नहीं थी। क्यों देखें: ईमानदार कोशिश है जिसमें कई समस्याओं को एक साथ समेटने की कोशिश की गई है। थोड़ी कमजोर है लेकिन पॉजिटिव संदेश है तो देखना बनता है।
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Friday, November 26, 2021
रिव्यू: हिकअप्स एंड हुकअप्स
कहानी वसुधा राव () की उम्र 39 साल है। डिवोर्स हो चुका है। सिंगल मदर हैं। वसुधा अपनी बेटी केय उर्फ कावण्या खट्टर (शिनोवा) और अपने भाई अखिल राव (प्रतीक बब्बर) के साथ रहती हैं। कहानी का सार यह है कि तीनों सिंगल हैं। तीनों की रोमांटिक लाइफ की अपनी-अपनी परेशानी है। अखिल को कमिटमेंट फोबिया है। वसुधा को प्यार में धोखा मिल चुका है, तलाकशुदा है। केय यंग है। तीनों अपनी-अपनी रोमांटिक लाइफ को एक्सप्लोर करना शुरू करते हैं। कहानी हुकअप्स के बीच हिकअप्स की है। आज के दौर की कहानी है, जो कई मायनों में ये भी बता जाती है कि दुनिया प्यार और भावनाओं के मामले कितनी आगे निकल चुकी है। रिव्यू लारा दत्ता और प्रतीक बब्बर स्टारर वेब सीरीज 'हिकअप्स एंड हुकअप्स' की चर्चा ट्रेलर रिलीज के साथ ही शुरू हो गई थी। इसकी एक बड़ी वजह थी शो की कहानी, उसकी थीम। बहुत से लोगों को यह समय से आगे की कहानी लग सकती है। डायरेक्टर कुणाल कोहली ने मॉर्डन जमाने में डेटिंग, रोमांस और समय से साथ आज के पैरेंट्स के बदलते सोच को भी दिखाने की कोशिश की है, जो अपने बच्चों से माता-पिता नहीं दोस्त बनकर मिलते हैं। खैर, कहानी आगे बढ़ती है। अखिल ने एक डेटिंग ऐप बनाया है 'केचअप' और वसुधा इसी ऐप के जरिए अपनी जिंदगी में प्यार तलाश रही है। अखिल की दोस्त फातिमा के किरदार में मीरा चोपड़ा हैं। वसुधा को कैजुअल सेक्स चाहिए, लेकिन यह चाह डेटिंग ऐप पर उसके एक्सपीरियंस को क्रेजी बना देता है। वसुधा की बेटी केय, आज के जमाने की लड़की है। थोड़ी जिद्दी, थोड़ी कन्फ्यूज्ड। जबकि अखिल को चाहिए एक ऐसा प्यार, जिसके साथ उसकी रफ्तार थोड़ी धीमी हो जाए। पूरी सीरीज भाई-बहनों के रिलेशनशिप स्ट्रगल पर फोकस्ड है। दोनों की बातचीत में फिल्टर नहीं है। वो डेटिंग की बात करते हैं। कैजुअल सेक्स की बात करते हैं। रिलेशनशिप की बात होती है और तमाम ऐसी चर्चाएं, जिस पर बात करते हुए हम अक्सर फुसफुसाते हैं। इन सब के बीच कुछ न कुछ ऐसा आता है कि कॉमेडी को पैर पसारने का मौका मिलता है। हालांकि, नए-नए ओटीटी के दर्शकों को इस तरह का खुलापन असहज कर सकता है। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि यह कहानी भले ही काल्पनिक है, पर कुणाल कोहली ने वह दिखाने की कोशिश की है, जो हमारे शहरों के एक तबके में सामान्य है। कुणाल कोहली ने 'हम तुम' और 'फना' जैसी फिल्में बनाई हैं। ये दोनों ही फिल्में सेंसिबल लव स्टोरी को दिखाती हैं। 'हिकअप्स एंड हुकअप्स' भी रोमांटिक-ड्रामा है, लेकिन ये आज की कहानी है। लारा दत्ता और प्रतीक बब्बर ने कहानी के मुताबिक, भाई-बहन के किरदार में जान डाली है। दोनों के कंधों पर यह सीरीज टिकी है और दोनों ने ही इसे बखूबी निभाया है। केय के किरदार से शिनोवा ने ऐक्टिंग डेब्यू किया है और वह अट्रैक्ट करती हैं। इस सीरीज में मुकेश छाबड़ा भी हैं। इंडस्ट्री के इस मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर ने ही शो की पूरी कास्टिंग भी की है। वह शो में लारा दत्ता के बॉस के रोल में हैं। वह जब भी पर्दे पर आते हैं, कॉमेडी का तड़का लगाते हैं। 'हिकअप्स और हुकअप्स' की कहानी इंदिरा बिष्ट ने लिखी है। उन्होंने कहानी में कई परतें जोड़ी हैं। आप एपिसोड दर एपिसोड आगे बढ़ते हैं। कहानी की परतें खुलती जाती हैं। स्नेहा खानवलकर का संगीत कहानी और शो की थीम के मुताबिक है। कुल मिलाकर 'लायन्सगेट प्ले' का यह पहला इंडियन ऑरिजनल सीरीज दो पीढ़ियों के बीच प्यार, रोमांस और डेटिंग के बदलते तरीके और भाव को हल्के-फुल्के अंदाज में बयान करता है। इसे फुर्सत के पलों में देखा जा सकता है।
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Thursday, November 25, 2021
मूवी रिव्यू: छोरी
कहानीसाक्षी 8 महीने से प्रेग्नेंट है। हेमंत उसका पति है। दोनों बहुत खुश है अपनी जिंदगी में। हेमंत बिजनसमैन है। कर्ज में डूबा है। पैसे नहीं चुका पा रहा। उसे धमकी मिलती है कि यदि पैसे नहीं चुकाए तो बुरे नतीजे भुगतने होंगे। इस डर से यह कपल अपना घर छोड़ एक अंजान जगह शिफ्ट हो जाते हैं, ताकि सुरक्षित रह सके और कुछ समय मिल जाए पैसों की व्यवस्था करने में। दोनों अपने ड्राइवर के गांव में हैं। इस गांव पर भूतों का साया है। गांव का एक इतिहास है, जिसमें कई भयानक किस्से दफ्न हैं। रिव्यू की 'छोरी' हॉरर फिल्म है। यह डराती है। लेकिन साथ ही एक जरूरी मेसेज देती है। क्लाइमेक्स तक आते-आते यह फिल्म आपके गले में एक गांठ छोड़ देती है। कन्या भ्रूण हत्या और भ्रूण हत्या की अमानवीय प्रथा पर एक पूरी ताकत से चोट करती है। पिछले कुछ महीनों में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कई हॉरर फिल्में रिलीज हुई हैं। इनमें से कई ने दर्शकों को डराने का काम किया है। जबकि यह फिल्म एक ऐसी कहानी लेकर आई है, जो डराती भी है और साथ ही एक ऐसी प्रासंगिक कहानी कह जाती है, जो आपके साथ टिकती है। डायरेक्टर विशाल फुरिया ने एक ऐसे मुद्दे पर बात की है, जो न सिर्फ ज्वलंत है, बल्कि इस पर चर्चा और बहस भी जरूरी है। फिल्म के ऐक्टर्स की परफॉर्मेंस असर छोड़ती है। साथ ही हॉरर यानी डर का फ्लेवर भी असरदार है। 'छोरी' को एक एंटरटेनिंग फिल्म है, जो हमारे सामाज की बुराइयों के बारे में भी सोचने पर मजबूर करती है। फिल्म की कहानी के डिटेल्स और इसमें हॉरर की बात करने का मतलब होगा फिल्म के बारे में स्पॉइलर देना। इसलिए जो जानना जरूरी है, वह यह है कि एक प्रेग्नेंट महिला है। एक उजाड़ घर है। बच्चे हैं और एक ऐसा गांव है, जहां बहुत कम लोग रहते हैं। फिल्म में कैरेक्टर्स बहुत ज्यादा नहीं हैं, इसलिए पर्दे पर कहानी को रोमांच और चौंकाने वाले सीन्स से भरा गया है। बतौर दर्शक 'छोरी' आपको बांधे रखती है। फिल्म के प्लॉट में एक गांव है। सेटअप अच्छा है और यह आपको असल लगता है। फिल्म में कैमरे के मूवमेंट से कई डरावने सीन्स क्रिएट किए गए हैं। एक समय पर आपको महसूस होता है कि फिल्म में कैमरा भी एक कैरेक्टर है। सिनेमेटोग्राफर अंशुल चोबे ने कैमरे से जबरदस्त और मुश्किल दिखने वाला काम किया है। खासकर कैमरे को कहानी में एक कैरेक्टर की तरह रखकर दर्शकों में डर और तनाव पैदा करने का काम तारीफ के काबिल है। फिल्म में कई सीन ऐसे हैं, जहां आपको गुस्सा भी आएगा और दुख भी होगा। एक ऐसा ही सीन है, जहां सूखे कुएं में कई बच्चों की लाश है। या वो सीन जब तीन मृत बच्चे सुनेनी से कहते हैं कि वे उसके नवजात की देखभाल करेंगे। मीता वशिष्ठ जैसी ऐक्ट्रेस को पर्दे पर देखकर अच्छा लगता है। नए जमाने के डायरेक्टर्स द्वारा ऐसे कलाकारों की कास्टिंग दिल छू लेती है। मीता वशिष्ठ 1989 से इंडस्ट्री का हिस्सा हैं। उन्होंने 'द्रोहकाल', 'दृष्टि' और 'कस्बा' जैसी फिल्मों में काम किया है, लेकिन आपको महसूस होता है कि इन सब के बावजूद इंडस्ट्री ने उन्हें उनका हक नहीं दिया। शुक्र है कि 'छोरी' उन्हें फिर से सुर्खियों में ला देती है। भानो देवी के किरदार में मीता ने गजब की परफॉर्मेंस दी है। जरूरत पड़ने पर वह पर्दे पर बुरी बन जाती हैं और जब सीन की मांग हो तो केयरिंग भी बन जाती हैं। 'छोरी' के केंद्र में नुसरत भरूचा का किरदार है। गर्भवती महिला साक्षी के रूप में उन्होंने अच्छा और आकर्षक काम किया है। एक सुनसान गांव में छिपकर परिवार और अपने अजन्मे बच्चे को परेशानी से बचाने और उसकी रक्षा करने की एक मां के संघर्ष को वह बखूबी जी जाती हैं। नुसरत ने 'प्यार का पंचनामा' के साथ इंडस्ट्री में डेब्यू किया था। एक ऐक्ट्रेस के तौर पर उन्होंने बीते कुछ साल में अलग-अलग तरह के चैलेंजिंग रोल्स किए हैं, जो सराहनीय है। 'छोरी' नुसरत के करियर में एक ऐसी फिल्म है, जो बतौर ऐक्ट्रेस उनकी सबसे मुश्किल भूमिकाओं में से है। उन्होंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है। हेमंत के किरदार में सौरभ गोयल स्वाभाविक दिखते हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले ने उनके कैरेक्टर को ज्यादा मौका नहीं दिया है। काजला के रोल में राजेश जैस के पास मीता की तुलना में स्क्रीनटाइम कम है, लेकिन वह छाप छोड़ते हैं। विशाल फुरिया ने अपनी ही मराठी फिल्म 'लापछापी' को हिंदी में रीमेक किया है। 'छोरी' अपनी ऑरिजनल फिल्म की तरह डराने में कामयाबी हासिल करती है। हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि फिल्म में कमियां नहीं हैं। हेमंत का किरदार को और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था। आधी फिल्म बीतते-बीतते आप समझ जाते हैं कि वह कौन हैं। एक सीन है जब उन पर हमला होता है और फिर वह पूरी तरह से गायब हो जाते हैं। फिल्म में इसके बाद हेमंत की एंट्री क्लाइमेक्स में होती है। राजेश जैस के किरदार को ज्यादा स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था, क्योंकि वह भी पार्टनर इन क्राइम हैं। फिल्म एक समाजिक बुराई कन्या भ्रूण हत्या पर केंद्रित है। हालांकि, डायरेक्टर ने राज्य का नाम नहीं लिया है, लेकिन आप समझ जाते हैं कि यहां बात हरियाणा की हो रही है। एक ऐसा राज्य जहां इस अमानवीय प्रथा का सबसे खराब रिकॉर्ड है। 'छोरी' एक ऐसी फिल्म है जिसमें रोमांच है, डरावनी है। यदि हॉरर जॉनर की बात करें तो यह फिल्म किसी हवा के झोंके की तरह आती है और वीकेंड में आपको डर महसूस करवाकर चली जाती है।
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Wednesday, November 24, 2021
मूवी रिव्यू: सत्यमेव जयते 2
कहानी सत्या आजाद () गृह मंत्री हैं। राज्य को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलवाना चाहते हैं। एंटी करप्शन बिल लाना चाहते हैं। लेकिन सदन में उनके साथी दल के सदस्य उनका साथ नहीं देते हैं। बिल पर सदन में बहुमत नहीं मिलने के कारण सत्या निराश है। दुख इस बात का भी है कि उसकी पत्नी विद्या () जो विपक्ष में है, वह भी उनका साथ नहीं देती। इस बीच शहर में कुछ हत्याएं होती हैं। एसीपी जय आजाद (जॉन अब्राहम) को बुलाया जाता है। हत्यारों को पकड़ना है। अब यदि आप यह सोच रहे हैं कि यह कहानी दो भाइयों की है। भाई की भाई से लड़ाई के बीच है तो जरा ठहरिए, क्योंकि इस कहानी में आगे और भी बहुत कुछ है। रिव्यू साल 2018 में रिलीज 'सत्यमेव जयते' की कहानी भ्रष्टाचार और सत्ता की भूख पर आधारित थी। ऐसे में 'सत्यमेव जयते 2' के लिए भी वही थीम एक जरूरत बन गई थी। राइटर-डायरेक्टर मिलाप जावेरी और उनकी टीम ने इस थीम को बचाए और बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। 'सत्यमेव जयते 2' को 80 के दशक की मास फिल्म की तरह बुना गया है। जब पर्दे पर आप यह देखते हैं कि जॉन अब्राहम का किरदार निर्दोष लोगों की हत्या के गुनहगार को को सजा देने वाला ईमानदार इंसान बन गया है तो आपको आश्चर्य नहीं होता। आपको यह जानकर भी आश्चर्य नहीं होता कि गुनहगारों को मौत की सजा देने वाला और कोई नहीं, बल्कि सत्या है। जय को तो बस इसकी ईमानदारी से जांच करने और न्याय दिलाने के लिए लाया गया है। मिलाप जावेरी यह जाहिर करने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं कि उनकी फिल्म 80 के दशक की फिल्मों को एक ट्रिब्यूट है। फिल्म के डायलॉग और स्क्रीनप्ले में यह बात पूरी तरह झलकती है। उदाहरण के लिए- सत्या का एसीपी को फोन कर यह कहना कि वह गुनहगारों को सजा देगा, चाहे इसके लिए कुछ भी हो जाए। या फिर जय की एंट्री वाला सीन या दादासाहब आजाद (फिर से जॉन अब्राहम) का किसान के रूप में वह सीन, जहां वह सफेद कपड़ों में एक हाथ से खेत जोतते हुए नजर आते हैं और दोनों भाई केसरिया और हरे रंग के कपड़ों में। फिल्म में क्लाइमेक्स से ठीक पहले एक वो भी सीन है, जहां दोनों भाई आपस में लड़ते हैं। कुल मिलाकर फिल्म में थीम के हिसाब से मसाला भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। मिलाप जावेरी ने फिल्म में एकसाथ कई मुद्दों को शामिल करने की कोशिश की है। इसमें भ्रष्टाचार की बात है। किसानों के आत्महत्या का मुद्दा है। महिलाओं के खिलाफ अपराध का मुद्दा है। निर्भया कांड की भी चर्चा है। लोकपाल बिल है। धार्मिक सदभावना की बात है। धार्मिक सहिष्णुता का भी जिक्र है। और तो और राइटर-डायरेक्टर आज की मीडिया और सोशल मीडिया के रोल के ऊपर भी कॉमेंट करने से नहीं चूके हैं। पर्दे पर जॉन अब्राहम का इस जांचे-परखे मसाला ओल्ड-स्कूल फिल्म में कंफर्ट दिखता है। फिर चाहे जुड़वा भाइयों का किरदार हो या उनके पिता का। ट्रिपल रोल के बावजूद जॉन अब्राहम ने इसे बड़ी सहजता और निश्चिंतता के भाव से निभाया है। यदि वह पर्दे पर सत्या के रूप में थोड़ा संयम दिखाते हैं, तो वे जय के रूप में या विधानसभा में लोकपाल विधेयक की लड़ाई करते हुए एक साधारण किसान दादासाहेब के किसानों के नेता बनने से भी नहीं कतराते हैं। दिव्या खोसला कुमार अच्छी लगी हैं। इस पुरुष प्रधान फिल्म में भी उनके लिए एक प्रमुख भूमिका है। विद्या का किरदार ऐसा है, जो सही के साथ है। वह असहमत होने पर चुप रहना पसंद करती है, लेकिन मुद्दों पर अपने पति सत्या और मंत्री पिता (हर्ष छाया) का विरोध करने से भी गुरेज नहीं करती हैं। गौतमी कपूर फिल्म में दादासाहब की पत्नी और सत्या और जय की मां के किरदार में हैं और ठीक लगी हैं। इसके अलावा हर्ष छाया, अनूप सोनी, जाकिर हुसैन, दयाशंकर पांडे और साहिल वैद ने अपने हिस्से को बखूबी निभाया है। फिल्म के गाने कानों को सुकून देते हैं। फिर चाहे वह वेडिंग सॉन्ग 'तेनु लहंगा' हो या करवा चौथ का सॉन्ग 'मेरी जिंदगी तू।' इसके अलावा नोरा फतेही का धमाकेदार आइम नंबर 'कुसु कुसु' भी है। 'सत्यमेव जयते 2' एक हार्डकोर ऐक्शन फिल्म है। जॉन अब्राहम ऐक्शन हीरो के रूप में निराश नहीं करते हैं। फिर चाहे वह हाथों से मोटरसाइकिल उठाना हो या एक एसयूवी के इंजन को दो हिस्सों में फाड़ना और धरती पर मुक्के से दरार लाना। ऐक्शन के दीवानों के लिए फिल्म में सीटियां बजाने के लिए बहुत कुछ है। वैसे तो हम यह समझ जाते हैं कि फिल्म 80 के दशक के सिनेमा को ट्रिब्यूट है, लेकिन फिर भी तीन जॉन अब्राहम को एकसाथ पर्दे पर एक हेलीकॉप्टर को उड़ने से रोकने का सीन देख ऐसा जरूर लगता है कि यह कुछ ज्यादा हो गया। कुल मिलकार यदि आप मास मसाला फिल्म पसंद करते हैं। तीन-तीन जॉन अब्राहम को पर्दे पर एकसाथ देखना चाहते हैं। 80 के दशक की फिल्मों में गोता लगाने का मन है तो 'सत्यमेव जयते 2' देख सकते हैं।
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Friday, November 19, 2021
मूवी रिव्यू: बंटी और बबली 2
रौनक कोटेचा पिछले काफी दिनों से फिल्म '' काफी चर्चा में थी। यह फिल्म 2005 में आई फिल्म 'बंटी और बबली' का सीक्वल है। हालांकि इस बार अभिषेक बच्चन की जगह सैफ अली खान ने और अमिताभ बच्चन की जगह पंकज त्रिपाठी ने ले ली है। साथ में सिद्धांत चतुर्वेदी और शरवरी वाघ की जोड़ी बंटी और बबली बनकर लोगों को चूना लगा रहे हैं। कहानी: ट्रेलर से साफ है कि इस बार भी बंटी और बबली की जोड़ी लोगों को चूना लगाएंगे मगर इस बार ये जोड़ी कुणाल (सिद्धांत चतुर्वेदी) और सोनिया (शरवरी वाघ) की है। बंटी और बबली के रूप में चूना लगाने वाले राकेश (सैफ अली खान) और विम्मी त्रिवेदी (रानी मुखर्जी) ने 15 साल पहले ही लोगों धोखा देना छोड़ दिया है और अब वह यूपी के फुर्सतगंज में रह रहे हैं। राकेश रेलवे में टिकट कलेक्टर है जबकि विम्मी एक सामान्य हाउस वाइफ। अचानक पता चलता है कि बंटी और बबली के नाम पर कोई लोगों चूना लगा रहा है। ये इंजिनियरिंग से पास हुए कुणाल और सोनिया हैं। इन नए बंटी और बबली को पकड़ने के लिए पुलिस इंस्पेक्टर जटायु सिंह (पंकज त्रिपाठी) पुराने बंटी और बबली की मदद लेता है। अब नए बंटी और बबली तक ये लोग कैसे पहुंचते हैं यही फिल्म की कहानी है। रिव्यू: फिल्म में पुरानी 'बंटी और बबली' की पॉप्युलैरिटी को कैश करने की कोशिश की गई है। हालांकि पहली फिल्म डायरेक्ट कर रहे वरुण वी शर्मा कहानी को आगे बढ़ाने में लड़खड़ाते नजर आते हैं। फिल्म में सिद्धांत चतुर्वेदी और शरवरी वाघ की जोड़ी के धोखाधड़ी देने के तरीकों को इंट्रेस्टिंग बनाने की कोशिश की गई है लेकिन पूरी फिल्म बचकाना सी नजर आती है। फिल्म का पहला हाफ में केवल कहानी के लिए बेस बनाने में निकल जाता है और फिल्म आगे नहीं बढ़ती। दूसरे हाफ में फिल्म का प्लॉट तो तैयार हो जाता है लेकिन कहानी और स्क्रीनप्ले बिना किसी लॉजिक के नजर आते हैं। ऐक्टिंग: फिल्म में सैफ अली खान, रानी मुखर्जी और पंकज त्रिपाठी के रूप में तीन मंझे हुए कलाकार हैं और सिद्धांत चतुर्वेदी और शरवरी वाघ प्रॉमिसिंग नजर आते हैं लेकिन ढीली कहानी और लचर स्क्रिप्ट ने इनकी ऐक्टिंग बेकार कर दी है। रानी मुखर्जी और सैफ अली खान की जोड़ी अच्छी नजर आती है और दोनों ने मिडिल क्लास पति-पत्नी के कैरेक्टर में जान डाल दी है। सिद्धांत चतुर्वेदी ने काफी मेहनत से अपना किरदार निभाया है और शरवरी वाघ अपनी पहली ही फिल्म में काफी कॉन्फिडेंट नजर आ रही हैं। दोनों की जोड़ी तो अच्छी है मगर उनके कैरेक्टर्स में जान नहीं डाली गई है जिससे ऑडियंस कनेक्ट नहीं हो पाती है। पंकज त्रिपाठी की कॉमिक टाइमिंग गजब है और वह अपने गंवई अंदाज में जटायु सिंह के रूप में अच्छे नजर आते हैं। क्यों देखें: पहली 'बंटी और बबली' की तुलना में यह फिल्म काफी लचर है। केवल रानी मुखर्जी, सैफ अली खान और पंकज त्रिपाठी की ऐक्टिंग और सिद्धांत चतुर्वेदी, शरवरी वाघ की मेहनत की खातिर फिल्म देख सकते हैं।
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मूवी रिव्यू: कैश
कहानी अरमान गुलाटी (अमोल पाराशर) यंग है। उसके पास आइडियाज की कमी नहीं है। स्टार्टअप में उसे बहुत भरोसा है। पैसे कमाने का जुनून है। हर बिगड़ते काम को जुगाड़ से बना लेता है। हां, ये अलग बात है कि उसके आइडियाज का किस्मत से कनेक्शन ठीक नहीं है। इसलिए उसके बिजनस शुरू होने से पहले बंद हो जाते हैं। इसी बीच आती है नोटबंदी। अरमान के चाचा के पास 500 और 1000 के नोट में 5 करोड़ रुपये हैं। ब्लैक को व्हाइट बनाना है। मनी लॉन्ड्रिंग का खेल शुरू होता है। भागदौड़ शुरू होती है। लड़की की एंट्री होती है। पुलिस और एक बाहुबली पूर्व विधायक की भी कहानी में एंट्री होती है। कहानी एक फन राइड की तरह आगे बढ़ती है और क्लाइमेक्स तक पहुंचती है। रिव्यू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को देश में नोटबंदी की घोषणा की थी। हिंदुस्तान के हर कोने में लोगों ने इस दौरान तरह-तरह की समस्याओं का सामना किया। इसका कालेधन पर कितना असर हुआ यह तो पता नहीं, लेकिन आम जनता की सुबह और शाम बैंक के बाहर लाइन में जरूर बीती। लेकिन इसी बीच हम सभी ने अपने आस पास ऐसे लोगों को भी देखा जो अपने कालेधन को किसी न किसी तरह सफेद बनाने के लिए अलग-अलग चोचले अपनाते दिखे। फिर चाहे घर में काम करने वाली बाई के अकाउंट में पैसे डालने हो या फिर कुछ और। फिल्म का हीरो अरमान गुलाटी (अमोल पाराशर) को पैसा कमाना है। उसके स्टार्टअप आइडियाज अक्सर फेल हो जाते हैं। नोटबंदी में उसे समझ आता है कि मनी लॉन्ड्रिंग कर वह कमीशन से पैसे बना सकता है। तेज-तर्रार है, इसलिए वह पैसों को घुमाना जानता है। अब उसके पास 5 करोड़ रुपये हैं, जिसे वह जूलरी शॉप से लेकर रेलवे के टिकट तक हर जगह घुमाता है। जाहिर है, पैसे ज्यादा हैं तो इस चक्कर में भागदौड़ भी ज्यादा होगी। फिल्म में कॉमेडी के साथ एक सस्पेंस भी है कि क्या अरमान पैसों का यह झोलझाल कर पाते हैं, हालांकि इसका पता आपको क्लाइमेक्स में चलता है। डायरेक्टर ऋषभ सेठ पर्दे पर नोटबंदी के बहाने एक ऐसी कॉमेडी फिल्म लेकर आए हैं, जो आपको थकाती नहीं है। औसत मनोरंजन करती है। कहीं-कहीं हंसाती भी है। साथ ही साथ फिल्म के बहाने हमें बहुत से ऐसे तरीकों के बारे में भी जानकारी मिलती है, जिससे कहीं न कहीं नोटबंदी के दौरान कालेधन को सफेद में बदला गया है। फिल्म ओटीटी पर रिलीज हुई है और ऐसी है, जिसे आप रात को डिनर करते हुए फैमिली के साथ देख सकते हैं। फिल्म का कैनवस बहुत बड़ा नहीं है। यह आम जिंदगी जैसी है। वीएफएक्स या बड़े सेट्स की कहानी में गुंजाइश नहीं है। इसलिए यह हल्के-फुल्के अंदाज में आगे बढ़ती रहती है। अमोल पाराशर को हमने हाल ही 'सरदार उधम' में देखा है। 'रॉकेट सिंह' से फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले अमोल पर्दे पर कॉन्फिडेंट दिखते हैं। लेकिन उनमें उस चार्म की कमी दिखती है, जो फिल्म को अपने कंधों पर खींच ले जाए। उनके दोस्त के किरदार में हैं, जो न चाहते हुए भी हर बार उसका साथ देते हैं। कैविन टैलेंटेड ऐक्टर हैं और वह नैचुरल लगे हैं। फिल्म की ऐक्ट्रेस स्मृति कालरा के हिस्से करने को बहुत कुछ नहीं है। स्वानंद किरकिरे और गुलशन ग्रोवर ने भी अपने हिस्से का काम अच्छा ही किया है। फिल्म में ज्यादा गाने नहीं हैं। इसका संगीत आपके साथ नहीं रहता, लेकिन फिल्म के दौरान आपको बोर भी नहीं करता। डायरेक्टर ऋषभ सेठ की कोशिश अच्छी है। लेकिन एक समस्या यह है कि वह जिस दौर की कहानी सुना रहे हैं, उसे 5 साल बीत चुके हैं। ऐसे में शुरुआत में बतौर दर्शक कहानी से कनेक्ट करने में टाइम लगता है। इसका एक कारण यह भी है कि नोटबंदी के बाद देश में कोरोना जैसी महामारी ने लोगों को इस कदर कैद किया कि दौर की परेशानियां अब कम लगने लगी हैं। कुल मिलाकर 'कैश' की अच्छी बात यह है कि यह बोझिल नहीं लगती। हालांकि यह ऐसी भी नहीं है कि 1 घंटे 58 मिनट के बाद इसे याद रखते हैं। फिल्म टाइमपास है और एक बार जरूर देखी जा सकती है।
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Friday, November 5, 2021
मूवी रिव्यू: इटर्नल्स
मार्वल सिनमैटिक यूनिर्वस के दस सुपरहीरोज की दमदार फौज हो, जिनको पर्दे पर उतारने का जिम्मा ऑस्कर विजेता निर्देशक क्लोई जाओ पर हो। साथ में एंजेलिना जोली (Anjelina Jolie, रिचर्ड मैडन (), सलमा हायक (Salma Hayek), किट हैरिंगटन (Kit Harington) जैसे नामी सितारों की लंबी-चौड़ी कतार हो, तो उस फिल्म के लिए दर्शकों की उम्मीदें भी कई गुना बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि हॉलिवुड फिल्म 'इटर्नल्स' (Eternals) के लिए भी दर्शकों में काफी उत्साह है। एमसीयू की पुरानी फिल्मों के सांसें रोक देने वाले ऐक्शन और रोमांच से अलग इस फिल्म में इंसानियत, भावनाओं, ठहराव, विविधता पर ज्यादा जोर दिया गया है, जिससे 'अवेंजर्स' के जादू के मुरीद रहे एमसीयू फैंस थोड़े निराश हो सकते हैं। कहानी कहानी दस अमर सुपरहीरोज इटर्नल्स की है, जिन्हें ब्रह्मांड से इंसान को बचाने के लिए भेजा गया है। ये सभी बेहद शक्तिशाली एरिशेम के निर्देशों का पालन करते हैं। ये इटर्नल्स 7000 सालों से धरती पर गुमनाम जिंदगी जीते हुए दानव रूपी डेविएंटस से उसकी रक्षा कर रहे हैं। इन इटर्नल्स की मुखिया हैं एजैक (सलमा हायक), जो एरिशेम के निर्देशों के हिसाब से बाकी इटर्नल्स को संचालित करती हैं। वहीं, टीम में सबसे पावरफुल है, इकरीस (रिचर्ड मैडन)। उनके अलावा ताकतवर गिल्गमेश (डॉन ली), इमोशनल सरसी (जेमा चैन), शक्तिशाली फास्टोस (ब्रायन टायरी हेनरी), हसोड़ किंगो (Kumail Ali Nanjiani), तेज रफ्तार मक्कारी (लॉरेन रिडलॉफ-Lauren Ridloff), ताकतवर थीना (एंजेलीना जोली), दूसरों का दिमाग वश में कर लेने वाला ड्रयूग (बैरी कियोगन-Barry Keoghan) और रूप बदल लेने वाली स्प्राइट (लिया मैकह्यू) है। डेविएंट्स के खात्मे के बाद एजैक के कहे अनुसार, ये सभी इटर्नल्स अलग-अलग जगहों पर आम इंसान की तरह जिंदगी बिता रहे हैं। इनमें भारतीय दर्शकों के लिए सबसे रोचक है, बॉलिवुड स्टार बने किंगो और उनके मैनेजर करुण यानी हरीश पटेल की जुगलबंदी। इस जोड़ी की कॉमिडी हंसाती है, पर साथ ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को महज मसखरा समझने के अमेरिकन दृष्टिकोण को भी फिर उजागर कर देती है। खैर, एक बड़े खतरे का आभास होने पर ये सारे फिर इकट्ठा होते हैं, लेकिन तभी उन्हें पता चलता है कि उनके असली दुश्मन दरअसल डेविएंट्स हैं ही नहीं। उन्हें अपने अस्तित्व से जुड़ा एक गहरा राज पता चलता है, जिससे उनमें आपस में ही दो फाड़ हो जाता है। ये सब क्यों होता है? आगे क्या होता है? ये सब फिल्म देखकर पता चलेगा। समीक्षा 'अवेंजर्स' के बाद 'इटर्नल्स' निश्चित तौर पर एमसीयू की एक और बड़ी महत्वाकांक्षी कोशिश है। इस बार उन्होंने पहली बार मूक-बधिर से लेकर समलैंगिक सुपरहीरो तक विविधतापूर्ण टीम खड़ी की है, ऐक्शन के बजाय इमोशंस को वरीयता दी है। प्रॉडक्शन डिजाइन, विजुअल इफेक्ट्स, म्यूजिक उम्दा हैं, लेकिन 7000 साल तक का सफर करने वाली ये फिल्म मेसोपोटामिया से लेकर बेबीलोन तक, मुंबई से लेकर लंदन तक, ईसा पूर्व से लेकर गुप्त काल तक इतनी जगह ट्रैवल करती है कि इस पहेली को याद रख पाना मुश्किल होता है। फिल्म में इतने सारे किरदारों और उन सभी की कहानियों के बीच भी दर्शक उलझकर रह जाते हैं। ऐक्शन सीक्वेंस कई जगह कमजोर लगते हैं। एंजेलीना जोली, किट हैरिंगटन जैसे ऐक्टर्स को पर्याप्त मौका न मिलना भी निराश करता है। हालांकि, आखिर में होने वाले खुलासे से अगले सीक्वल का इंतजार बना रहता है।
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Friday, October 29, 2021
हम दो हमारे दो
हिरेन कोटवानीबॉलिवुड में आजकल हल्की-फुल्की फैमिली कॉमिडी ड्रामा फिल्मों का चलन चल रहा है। इन फिल्मों की खासियत यह होती है कि इन्हें हर तरह की ऑडियंस पसंद करती है। अगर ऐसी फिल्म में जमे हुए ऐक्टर्स हों तो इन्हें सफलता की गारंटी माना जाता है। ऐसी ही फिल्म '' है जिसमें , , और रत्ना पाठक शाह कॉमिडी का जबर्दस्त तड़का लगाते नजर आ रहे हैं। कहानी: ध्रुव शिखर (राजकुमार राव) एक अनाथ लड़का है जो अपनी कठिनाइयों से लड़ते हुए एक सफल आदमी बन जाता है। वह अन्या मेहरा (कृति सैनन) से शादी करना चाहता है। अन्या एक ऐसे आदमी से शादी करना चाहती है जिसके पास एक प्यारी फैमिली और क्यूट डॉगी हो। अन्या की फैमिली एक एक्सिडेंट में खत्म हो गई थी जिसके बाद उसे भी अंकल ने अडॉप्ट कर लिया था। अब अन्या से शादी करने के लिए ध्रुव को अपना नकली परिवार बनाना है। इसके लिए वह पुरुषोत्तम मिश्रा (परेश रावल) को अपना पिता और दीप्ति कश्यप (रत्ना पाठक शाह) को अपनी मां बनने के लिए तैयार कर लेता है। हालांकि पुरुषोत्तम और दीप्ति की भी अपनी एक अलग कहानी है। रिव्यू: फिल्म की कहानी बहुत बढ़िया तरीके से शुरू होती है। डायरेक्टर अभिषेक जैन इससे पहले कई गुजराती हिट फिल्मों को डायरेक्शन कर चुके हैं। फिल्म का स्क्रीनप्ले प्रशांत झा ने लिखा है जो उतना दमदार नहीं है जितना हो सकता था। फिल्म का फर्स्ट हाफ फास्ट है मगर सेकंड हाफ थोड़ा बोझिल है क्योंकि आपको सब कुछ पहले से ही पता होता है। फिर ऐसा लगता है कि फिल्म को जल्दबाजी में हैपी एंडिंग के साथ खत्म कर दिया गया। ऐक्टिंग: ऐक्टिंग की बात करें तो राजकुमार राव कहीं से भी कम पड़ते नहीं नजर आते। राजकुमार राव बिना किसी ज्यादा कोशिश के अपने किरदार को जी जाते हैं। कृति सैनन ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया है। देखा जाए तो फिल्म की जान परेश रावल और रत्ना पाठक शाह हैं जो एक समय के बाद फिल्म में लीड ऐक्टर्स की तरह नजर आने लगते हैं। दोनों की केमिस्ट्री फइल्म में गजब की दिखाई देती है। अपारशक्ति खुराना को हीरो के दोस्त के किरदार में टाइपकास्ट कर दिया गया है। हालांकि उन्होंने अपना रोल बखूबी निभाया है। सानंद वर्मा, मनु ऋषि चड्ढा और प्राची शाह पंड्या सपोर्टिंग रोल्स में जंचे हैं। क्यों देखें: कुल मिलाकर यह एक अच्छी कॉमिडी फिल्म है। पूरे परिवार के साथ वीकेंड पर इसे देखा जा सकता है।
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Saturday, October 16, 2021
सरदार उधम
कहानी यह फिल्म देश की आजादी की लड़ाई के नायक सरदार उधम सिंह () को एक श्रद्धांजलि है। () लीड रोल में हैं। क्रांतिकारी सरदार उधम सिंह ने लंदन में माइकल ओ ड्वायर की गोली मारकर हत्या कर दी थी। साल 1940 की यह घटना, असल में 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला था। उस नृशंस हत्याकांड के वक्त माइकल ओ ड्वायर ब्रिटिश शासन काल के पंजाब के गवर्नर थे। माइकल ड्वायर ने जलियांवाला बाग में हुई सैकड़ों लोगों की हत्या को जायज बताया था। समीक्षा सबसे पहली बात, यदि आप ऐसे फिल्म की कल्पना कर रहे हैं, जो आपके अंदर देशभक्ति की आग जलाए, तो 'सरदार उधम' वैसी फिल्म बिल्कुल भी नहीं है। न ही आप इस फिल्म से ऐसी डायलॉगबाजी की आस लगाइए, जो रगों में दौड़ खून में उबाल ला दे। यह फिल्म पूरी तरह से आजादी से पहले के हिंदुस्तान में हुई सत्य घटनाओं पर आधारित है। ये एक ऐसे क्रांतिकारी की कहानी है, जो दुख और बदले की आग में जल रहा है। कहानी का हीरो अपने सुन्न हो चले दर्द को अपनी ताकत और खामोशी को ही अपनी आवाज बना लेता है। महज 20 साल की उम्र में सरदार उधम ने एक बर्बर अपराध देखा, सैकड़ों लोगों की हत्या ने उनके अंदर बदले की भावना को इस कदर मजबूत बना दिया कि उन्होंने इसे 20 साल बाद तक अपने जीवन का मकसद बनाए रखा। फिल्म का सेट द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत का है। कहानी कभी फ्लैशबैक में तो कभी आज के बीच दौड़ती-भागती है। फिल्म का कैनवस बहुत बड़ा है, लेकिन सरदार उधम सिंह पर जानकारी और कॉन्टेंट की कमी जान पड़ती है। यहां एक ऐसे इंसान की कहानी है, जो अंदर से जख्मी है, जो चुपचाप अपना काम करता रहा। ऐसे में एक चुनौती थी कि जो कुछ भी जानकारी उसके बारे में उपलब्ध हो, उन सारे बिंदुओं को जोड़कर उसे कैनवस पर उतरना। शूजित सरकार ने 'क्यों' को डिकोड करने की कोशिश की, न कि इसे कि उन्होंने जो किया वह 'कैसे' किया। फिल्म का उद्देश्य यह समझना है कि अमृतसर के एक मासूम लड़के की भावनाएं क्या थीं। जो किसी को गोली मारना तो दूर बंदूक भी नहीं रखना चाहता था। आखिर क्यों उसने माइकल ड्वायर पर पॉइंज जीरो से गोली चलाई और फिर भी मौके से नहीं भागा? क्या उसे बदला लेने के लिए प्रेरित किया गया था? दो दशकों तक वह उस दर्द को क्यों सहते रहे? एक ही व्यक्ति अलग-अलग लोगों के लिए क्रांतिकारी और आतंकवादी क्यों है? शूजित सरकार 'पीकू' और 'विक्की डोनर' जैसी फिल्में बना चुके हैं। उनकी फिल्मों का हीरो कभी हीरोज्म जैसी चीजें नहीं करता। सरदार उधम भी किसी इंसान या उसके देश से नफरत नहीं करते। उनकी लड़ाई दूसरों के बोलने और स्वतंत्र रूप से जीने के अधिकार और ब्रिटिश विचारधारा के खिलाफ थी। 2 घंटे, 42 मिनट का रनटाइम बहुत लंबा है। थका देता है। इस दरम्यान शूजित सरकार हमें एक मिशन पर ले जाते हैं। एक जिद्दी सरदार उधम से मिलवाते हैं। वह माइकल ड्वायर का किसी साये की पीछा करते हैं। फिल्म में लंबे समय तक, हम केवल एक इंसान की यात्रा के दर्शक बने रहते हैं। इस दौरान दर्शक कहानी से पूरी तरह जुड़ नहीं पाते। हम उन्हें लंदन में अजीबोगरीब नौकरियां करते दखते हैं जो एक हत्या की ओर बढ़ रहा है। फिल्म की रफ्तार आपको थका देती है। यह फिल्म एक टिक-टिक टाइम बम की तरह है जो फटने का इंतजार कर रही है, लेकिन सावधान रहें। यहां आपको धैर्य रखना है। सरदार उधम की मन के उथल-पुथल जब चरम पर पहुंचता है, तो बड़ी चालाकी से क्लाइमेक्स में इसे खत्म कर परिणाम तक पहुंचाया जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड पर पर्दे पर जिस तरह दिखाया गया है, वह आप पर असर छोड़ता है। सरदार उधम के रूप में विक्की कौशल ने एक ऐसा प्रयास किया है, जो उन्होंने पहले कभी नहीं किया। वह अनकहे शब्दों को अपनी आंखों से सामने रखने की पूरी कोशिश करते हैं। लेकिन इस तरह की फिल्म में इरफान की आंखें बोलती हैं, वही फिल्म की पहली पसंद भी थे। कुछ सीन्स में विक्की कौशल ने बढ़िया काम किया है। खासकर एक सीन में जहां वह नशे में धुत हैं। 20 साल की उम्र के किरदार में एक ब्रिटिश जांच अधिकारी के साथ उनकी बातचीत का सीन जबरदस्त है। 'मेरे जवानी का कोई मतलब बना?' यह सुनकर आपका भी दिल टूट जाता है। कहानी लिखते वक्त इसे क्लिशे से बचाने की पूरी कोशिश की गई है, लेकिन आखिर में यह समकालीन यानी आजकल वाली बात जैसा लगने लगता है। फिल्म में भगत सिंह के हिंग्लिश वाले डायलॉग्स जैसे, 'हम सिर्फ एक्सप्लॉयटेशन के अगेंस्ट हैं। हमें सेमी-इंडिपेंडेंस नहीं चाहिए।' इसे फिल्म की सेटिंग को देखते हुए जगह देने की कोशिश की गई है। फिल्म खत्म होने के बाद जो चीज दर्शकों के साथ रह जाती है, वो है सरदार उधम सिंह के अशांत अतीत की यादें और एक ब्रिटिश अधिकारी से जब वह पूछते हैं, 'जब आप 23 साल के थे तब आप क्या कर रहे थे?' सरदार उधम का साहस कभी नहीं डगमगाया। इस स्वतंत्रता सेनानी ने महाद्वीपों की यात्रा की, कई नकली पहचान बनाए और जीवनभर छुपकर, भीड़ में गायब रहे। यदि आप भी उनके इस शांत अस्तित्व की जानकारी होने को लेकर बहुत इच्छा रखते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है।
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Friday, October 1, 2021
शिद्दत
रौनक कोटेचा कहानी प्यार में इंसान क्या-क्या नहीं करता! जग्गी () एक युवा आशिक है। वह कार्तिका () से प्यार करता है। उसके प्यार में वह अपनी जिंदगी बदल देता है। इस उम्मीद में कि एक दिन उसे पा सकेगा। जग्गी को लगता है कि कार्तिका ही उसकी सोलमेट है। लेकिन उसकी यह प्यार की यात्रा इतनी आसान भी नहीं है। इसमें पेरशानियां हैं, सच का सामना है, एकतरफा प्यार है। तो क्या जग्गी अपने प्यार को पा लेगा? क्या वह अपने प्यार की इंतहा को साबित कर पाएगा? 'शिद्दत' अपने नाम की तरह ही प्यार की लगन की कहानी है। रिव्यू जग्गी (सनी कौशल) के लिए यह पहली नजर का प्यार है। लव एट फर्स्ट साइट। वह कार्तिका (राधिका मदान) को स्वीमिंग पूल से निकलते हुए देखता है। लेकिन प्यार की यह चिंगारी तत्काल नहीं भड़कती, वो कहते हैं ना कि 'नफरत प्यार की पहली सीढ़ी है', यह कहानी कुछ-कुछ ऐसे ही बढ़ती है। जग्गी हर तरह से कार्तिका को लुभाने की कोशिश करता है। डायरेक्टर कुणाल देशमुख हमें 90 के दशक की प्रेम कहानियों की तरह रिझाने की कोशिश करते हैं, जिसे आज के हिसाब से मॉर्डन सेटअप दिया गया है। हालांकि, एकतरफा प्यार में घिरे एक एक ऐसे आशिक को देखना थोड़ा परेशान करता है, जो एक लड़की के लिए जुनूनी है। वह 'ना' नहीं सुन सकता। 90 के दशक में सिनेमाई पर्दे पर न सिर्फ ऐसी कहानियां खूब दिखीं, बल्कि गानों और डांस के रूप में सिल्वर स्क्रीन पर इसका जश्न भी खूब मनाया गया। 'शिद्दत' इसके बहुत करीब लगती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि लेखक श्रीधर राघवन और धीरज रतन ने कहानी में लड़की को भी पूरा मौका दिया है। वह आज के जमाने की है। इंडिपेंडेंट है। अपने लिए खुद निर्णय लेना जानती है। 'शिद्दत' एक जुनूनी प्रेम कहानी है, जिसे मुख्य तौर पर कहानी के हीरो जग्गी के हिसाब से बुना गया है। उसका जुनून पागलपन जैसा है और इस बात को दर्शकों के दिल और दिमाग तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय दिया गया है। फिल्म का फर्स्ट हाफ पूरी तरह कैम्पस रोमांस पर फोकस है। इसमें फ्लर्ट है, खूब सारा नाच-गाना है। हालांकि, एक चीज जो आपको रोककर रखती है, वह यह है जिज्ञासा कि इस प्रेम कहानी में आगे क्या होने वाला है। 'शिद्दत' में बहुत से किरदार नहीं हैं। लेकिन जितने भी हैं, उन्हें बखूबी तैयार किया गया है। मोहित रैना और डायना पेंटी की कहानी में विश्वास की कमी झलकती है। वह फिल्म की मुख्य कहानी के इर्द-गिर्द सिर्फ सपोर्ट के तौर पर हैं। सनी कौशल के किरदार में जटिलता यह है कि वह जुनूनी प्रेमी है, जिसके चारों ओर कुछ सीमाएं हैं। फिर भी वह खुद को साबित करने के लिए अपना बेस्ट देते हैं। हालांकि, उनके कैरेक्टर का ग्राफ इस कदर उतार-चढ़ाव वाला है कि कुछ समय के बाद उस पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। राधिका मदान स्क्रीन पर कार्तिका के आंतरिक संघर्ष को दिखाने में लड़खड़ाती हैं। उनका स्ट्रगल साफ तौर पर झलकता है। गौतम के किरदार में मोहित रैना की कास्टिंग अच्छी है। वह एक इमिग्रेशन लॉयर की भूमिका में हैं। डायना पेंटी अपने किरदार में खूबसूरत लगी हैं। हालांकि, उनके किरदार को थोड़ा और निखार दिया जा सकता था। एक लव स्टोरी के तौर पर 'शिद्दत' में सचिन-जिगर का संगीत औसत से ऊपर है। फिल्म देखते-देखते यह आपको लुभाता है। अमलेंदु चौधरी की सिनेमेटोग्राफी भी प्रभावित करती हैं। 'शिद्दत' के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह कागज पर भले ही रोमांचक लगे, लेकिन पर्दे पर उतारने में यह खींचा हुआ जान पड़ता है। खासकर सेकेंड हाफ में फिल्म धीमी लगती है। कहानी कई बार वास्तविकता से कोसों दूर चली जाती है और बेतुकी भी लगती है। हालांकि एक सस्पेंस है, जो बतौर दर्शक आपको बांधे रखता है। वैसे, एक सच यह भी है आज के दौर में जहां रियलिस्टि फिल्मों का चलन है, हमें ऐसी जुनूनी, पागलपन से भरी और थोड़ी कच्ची प्रेम कहानी बहुत कम ही देखने को मिलती है। 'शिद्दत' आपको बहुत ज्यादा प्रभावित तो नहीं करती, लेकिन एक छाप जरूर छोड़ जाती है।
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Friday, September 10, 2021
भूत पुलिस
रेणुका व्यवहारेसैफ अली खान और अर्जुन कपूर की मुख्य भूमिका वाली फिल्म '' का जबसे ट्रेलर रिलीज किया गया है तभी से यह चर्चा में है। अब यह फिल्म ऑनलाइन प्लैटफॉर्म डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हो गई है। फिल्म में सैफ और अर्जुन के अलावा यामी गौतम और जैकलीन फर्नाडिस मुख्य भूमिकाओं में हैं। कहानी: फिल्म की कहानी दो तांत्रिक भाइयों विभूति (सैफ अली खान) और चिरौंजी (अर्जुन कपूर) की है जो भूत-प्रेत की बाधाओं को दूर करने का काम करते हैं। जहां विभूति पूरी तरह एक ढोंगी व्यक्ति है और लोगों को बेवकूफ बनाता है वहीं चिरौंजी तंत्र मंत्र और भूत-प्रेतों पर विश्वास करता है। इन दोनों को हिमाचल प्रदेश में एक चाय के बागान के भूत को भगाने की जिम्मेदारी दी जाती है जिसकी मालिक दो बहनें माया (यामी गौतम) और कनु () हैं। अब ये दोनों भाई तांत्रिक दिवालिया हो चुकीं दोनों बहनों माया और कनु की भूत को पकड़कर मदद कर पाते हैं या नहीं, यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी। रिव्यू: 'भूत पुलिस' से पहले हॉरर-कॉमिडी वाले जॉनर में 'स्त्री' सुपरहिट हो चुकी है। डायरेक्टर पवन कृपलानी ने इसी खास जॉनर पर दांव खेलने की कोशिश की है। हालांकि बचकाना सीन और डायलॉग्स के चलते यह फिल्म आपको मजेदार नहीं लगेगी। हालांकि फिर भी नेपोटिजम और गो-कोरोना-गो जैसे वनलाइनर्स आपको हंसाने के लिए काफी है। फिल्म में सैफ अली खान पता नहीं कहां कि भाषा बोल रहे हैं आप कन्फ्यूज हो जाएंगे। फिल्म में अर्जुन कपूर और यामी गौतम ने मेहनत करने की कोशिश की है मगर सैफ और जैकलीन धर्मशाला के टूरिस्ट जैसे लग रहे हैं जैसेकि फिल्म को शूट करना उनके लिए दूसरे नंबर का काम था। फिल्म की कहानी अच्छी है मगर इसके साथ एकदम खराब ट्रीटमेंट किया गया है। अगर फिर भी पूरी फिल्म में सबसे ज्यादा पॉजिटिव बाद करें तो जॉनी लीवर की बेटी जेमी लीवर ने बेहतरीन काम किया है। क्यों देखें: फिल्म में कुछ भी खास नहीं है फिर अगर देखनी है तो जेमी लीवर के लिए देख सकते हैं।
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