नई पीढ़ी की काबिल अदाकाराओं में से एक तापसी पन्नू (Taapsee Pannu) इन दिनों बॉलिवुड की सबसे व्यस्ततम ऐक्टर बन चुकी हैं। उनकी नई फिल्म 'लूप लपेटा' (Looop Lapeta) रिलीज के लिए तैयार है, तो 'शाबाश मिठू', 'ब्लर', 'दोबारा', 'वो लड़की है कहां', 'मिशन इम्पॉसिबल' आदि कतार में है। लेकिन पिछले कुछ सालों से लगातार एक फिल्म से दूसरी फिल्म करने, एक किरदार से दूसरे किरदार में ढलने में व्यस्त रहीं तापसी अब थोड़ा पैर टिकाना चाहती हैं। पढ़िए, ये खास बातचीत: 'लूप लपेटा', 'शाबाश मिठू', 'ब्लर', 'दोबारा', 'वो लड़की है कहां', 'मिशन इम्पॉसिबल' ... तापसी आपकी इतनी सारी फिल्में लाइन में हैं। कभी ये भूल तो नहीं जातीं कि अच्छा ये फिल्म भी साइन की है? इतने कम समय में इन अलग-अलग किरदारों में ढलने के लिए तैयारी कैसे करती हैं? (हंसकर) नहीं, जो साइन की होती है, वो तो नहीं भूलती, लेकिन कई फिल्में ऐसी होती हैं, जिसकी स्क्रिप्ट मैंने सुनी हो। उसका कॉन्सेप्ट पसंद आया हो और मैंने बोला हो कि आप इतने समय के बाद आना, तब डेट्स अडजस्ट करेंगे, लेकिन वो मैं भूल गई हूं कि अच्छा ये पहले सुनी थी। जो फिल्म कर रही होती हूं, वो नहीं भूलती। लेकिन ये मैंने प्लान नहीं किया था। ये तो लॉकडाउन की वजह से मेरी तैयारी वाले डेट्स खत्म हो गए। वैसे भी, मैं अपने डायरेक्टर पर बहुत ज्यादा निर्भर होती हूं कि वह मुझे गाइड करें कि किरदार के लिए क्या करना है, क्योंकि सिनेमा डायरेक्टर का माध्यम है और मैं खुद को डायरेक्टर की ऐक्ट्रेस मानती हूं। मैंने ऐक्टिंग की कोई ट्रेनिंग नहीं ली है, मुझे कोई मेथड पता नहीं है कि मैं कैसे एक करैक्टर में स्विच इन और आउट करूं। इसलिए, मैं इसके लिए अपने डायरेक्टर पर निर्भर रहती हूं। पिछले इंटरव्यू में आपने कहा था कि हर किरदार आपका एक हिस्सा ले जाता है, तो लूप लपेटा की सावी के किरदार में ढलने के लिए क्या मशक्कत करनी पड़ी? किसी भी किरदार में दो तरह की चुनौतियां होती हैं, एक तो फिजिकल और दूसरी मेंटल। इसमें फिजिकल वाला पार्ट तो आसान रहा, क्योंकि मैं रश्मि रॉकेट में एथलीट के लिए पहले से ही ट्रेनिंग कर रही थी, तो इसमें एक्स एथलीट के रोल में आसानी से खुद को ढाल लिया। फिल्म में दौड़ने वाले सीन रश्मि रॉकेट के ठीक बाद ही शूट किए थे, तो वो मुश्किल नहीं रहा। दूसरी, जो मेंटल तैयारी थी, किरदार को समझने की, तो उसके लिए शूट से पहले डायरेक्टर आकाश भाटिया के साथ बहुत ज्यादा चर्चा हुई थी। चूंकि, लॉकडाउन भी लग गया था, तो मुझे आकाश से इस पर बातचीत करने का भरपूर मौका भी मिल गया। लूप लपेटा जर्मन फिल्म 'रन लोला रन' की रीमेक है। इन दिनों बॉलिवुड में रीमेक का चलन बहुत बढ़ गया है। आप इसकी क्या वजह मानती हैं? क्या इससे एक सहूलियत रहती है कि एक बना-बनाया खाका और कहानी मिल जाती है? मेरे हिसाब से कोई भी दूसरी फिल्म को छापने की कोशिश नहीं करता। मुझे नहीं लगता कि कोई छापने के लिए या कॉपी-पेस्ट करने के लिए रीमेक बनाता है। हो सकता है कि उनके रीमेक करने का ढंग आपको न पसंद आए, किसी दूसरे को पसंद आए, जो कि नॉर्मल पिक्चरों के साथ भी होता है। ये ओरिजिनल स्क्रिप्ट के साथ भी होता है कि वो किसी को पसंद आती है, किसी को नहीं आती, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई इस नीयत के साथ फिल्म बनाता है कि फ्रेम बाय फ्रेम वैसी की वैसी छाप दो। फिल्म में एक मेसेज है कि इंसान अपनी गलतियों से सीखकर अनुभवी बनता है। आपने कोई ऐसी गलती की है, जिससे सबक लेकर आप अनुभवी बनी हों? गलतियां और असफलताएं इंसान की सबसे बड़ी टीचर होती हैं। आप सबसे ज्यादा अपनी गलतियों और असफलताओं से ही सीखते हैं। मुझे लगता है कि ये बात सब पर लागू होती है कि गलतियों से सीखो कि क्या नहीं करना चाहिए और पहले वाली गलती मत दोहराओ। मैं भी अपनी पुरानी गलती नहीं दोहराती हूं। मैं नई गलतियां करने में यकीन रखती हूं। आप किसी फिल्म में हॉकी खिलाड़ी होती हैं, तो किसी में क्रिकेटर, तो किसी में एथलीट। इसमें भी आप एथलीट बनी हैं, असल जिंदगी में खेल से कितना लगाव रहा है? इस फिल्म में तो मैं एक चोटिल रिटायर्ड एथलीट हूं, लेकिन हां, मैंने मैं शूटिंग कर ली है। रनिंग कर ली है। क्रिकेट खेल लिया है। हॉकी खेल ली है। मैंने सब कर लिया है और स्कूल में भी मैं एथलीट थी। स्कूल टाइम से ही मेरी स्पोर्ट में बहुत रुचि थी। इसलिए खेलों के प्रति मेरा प्यार दिखता है। इसी वजह से लोग मुझे एक एथलेटिक बैकग्राउंड वाले रोल देते रहते हैं, क्योंकि मैंने स्पोर्ट्स खेला है, तो उन्हें वो ज्यादा कंविंसिंग लगता है। मुझे अब भी स्पोर्ट्स बहुत पसंद हैं। अब भी मैं फिल्मों से ज्यादा स्पोर्ट्स देखती हूं। अब आप निर्माता भी बन चुकी हैं। अपनी फिल्म ब्लर में आप ऐक्टर और प्रड्यूसर दोनों हैं। ये दोहरी जिम्मेदारी निभाना कितना चैलेंजिंग रहा? जी, मैं ये नहीं कहूंगी कि बड़ा मजा आया, क्योंकि अगर आप फिल्म में प्रड्यूसर भी हैं, ऐक्टर भी हैं, तो बड़ा स्ट्रेसफुल हो जाता है। मैं ऐसा चाहती नहीं थी। मैं चाहती थी कि जिस फिल्म में मैं ऐक्टर हूं, उसमें ऐक्टर ही रहूं। मैं चाहती हूं कि ऐसी फिल्में बहुत कम रखूं, जिसमें मैं ऐक्टर और प्रड्यूसर दोनों रहूं, क्योंकि न चाहते हुए भी आपका दिमाग ऐक्टर से प्रड्यूसर पर चला जाता है, जो अच्छी बात नहीं है। ब्लर में परिस्थितियां कुछ ऐसी बन गईं कि मुझे उसे को-प्रड्यूस करना पड़ा, लेकिन मेरे प्रॉडक्शन बैनर के ज्यादातर फिल्में ऐसी होंगी, जिसमें मैं ऐक्टर नहीं रहूंगी। इस नए साल में आप क्या नया करना चाहेंगी और क्या नहीं करना चाहेंगी? इस साल मैं थोड़ा पैर टिकाना चाहूंगी। थोड़ा खुद के लिए समय निकालना चाहूंगी। इस फिल्म में जैसे भागने का पार्ट है, वो मैंने इसके बाद से नहीं करने का फैसला लिया है। ये मेरी जिंदगी का बहुत बड़ा फैसला है कि इसके बाद मैं नहीं भागूंगी। ये सभी ने मुझसे कहा कि बहुत भाग लिया, अब पैर टिकाने का वक्त आ गया है। लाइफ में केवल भागते नहीं रहना है। मैं उम्मीद करती हूं कि इस बार मेरा प्लान कामयाब हो और कुछ लॉकडाउन जैसी चीज न हो जाए, प्लान खराब करने के लिए। वरना फिर भागना पड़ेगा। मैं उम्मीद कर रही हूं कि अपने प्रोजेक्ट्स के बीच में थोड़ा गैप रखूं। लाइफ में थोड़ी सांस लूं।
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